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ग्राम कलवानी में भागवत कथा में गौशाला के लिए दो बीघा बहुमूल्य भूमिदान के साथ नगद, मशीनरी, निर्माण कार्य आदि के लिए कुल 77 लाख राशि का आया चढ़ावा




चूरू,। ग्राम कलवानी में ग्रामवासियों द्वारा गौ-सेवार्थ आयोजित भागवत कथा के विराम पर भगवद्भक्तों द्वारा गौशाला की स्थापना तथा गायों की सेवा के लिए अभूतपूर्व व उल्लेखनीय दान दिया गया। पूर्व सरपंच धन्नाराम जानू द्वारा गौशाला स्थापना के लिए बेशकीमती दो बीघा भूमि दान के साथ ही नगद, मशीनरी, चारा, निर्माण कार्य आदि के लिए दान देने वालों की एक अटूट श्रृंखला बन गयी। कुल 55 लाख नगद राशि 7 लाख की ट्रेक्टर, ट्रोली, चक्की व टेंकर 12 लाख का निर्माण कार्य जिसमें राधाकृष्ण मंदिर, गो-द्वार, कार्यालय कमरा, शौचालय, ट्यूबवेल व प्याऊ तथा 3 लाख राशि का चारा गौ सेवार्थ दिया गया। ग्राम के भामाशाह द्वारा सभी श्रद्धालु माता बहनों को कथा में चुनरी ओढ़ाकर सम्मान किया गया। कथा व्यास सेवानिवृत्त आईएएस पं. रामपाल शर्मा शास्त्री जैसलान ने बताया कि गायों की सेवा के लिए ग्रामवासियों का अनंत उत्साह सभी लोगों के लिए एक दर्शनीय व अनुकरणीय उदाहरण है। गांव के तथा विदेश इटली आदि के प्रवासियों द्वारा कथा में किये गये परिदान व चढ़ावे के अलावा यह वचन दिया गया कि कलवानी में गायों की सेवा व सुविधा के लिए उच्च तकनीक की गौशाला का निर्माण अतिशीघ्र किया जावेगा जो आत्म निर्भरता की मिसाल बन सके। इस हेतु बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं की फौज लग चुकी है। यह भी उल्लेखनीय है कि बहुत सारे दानदाताओं द्वारा गौशाला के संचालन के लिए प्रतिवर्ष एक माह पेंशन, नगद राशि व खेती बाड़ी में होने वाला चारा निरन्तर देने का वचन दिया। कथा के विराम पर कथा व्यास द्वारा श्रद्धालुओं को दान की महिमा वर्णन करते हुए संबोधित किया कि दिया दूर नहीं जात सनातन शास्त्रों में श्रद्धापूर्वक दिये गये दान का बहुत बड़ा माहात्म्य है। भगवद्गीता में सात्विक दान की महिमा बतायी गयी है। गायों के लिए अपने सामर्थ्य अनुसार कुछ भी दान करना बहुत बड़ा काम है। वसन्त ऋतु याचक बनकर वृक्षों के पत्ते मांग लेती है तो दाता वृक्षों पर सौ गुणा नये पत्ते बहुत जल्द शोभायमान हो जाते हैं। सुदामा निर्धन नहीं था, वह आत्मज्ञान का धनी था और अपने ज्ञान को बेचता नहीं था, बल्कि बांटता था सुदामा के चार मुट्ठी चावल मानव जीवन के उद्देश्य धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष के प्रतीक हैं। चौबीस गुरुओं के वर्णन के साथ पच्चीसवां गुरु अपने शरीर को विरक्ति व विवेक का हेतु बताया गया। अंत में श्रीशुकदेवजी ने राजा परीक्षित को अंतिम उपदेश दिया कि हे राजन्! मरता तो अचेतन जड़ शरीर है, चेतन आत्मा को पहचानो जो न जन्मती है, न मरती है। अतः आत्मरूप में स्थित होओगे तो जन्म मरण के चक्कर से मुक्त हो जाओगे। कथा विराम के बाद आरती, हवन, पूर्णाहुति व शोभायात्रा के बाद सभी करीब तीन हजार श्रद्धालुओं को भोजन प्रसाद कराया गया।

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